Sunday, 24 March 2013

कन्या भ्रूण हत्या


कन्या भ्रूण हत्या

सुनता आया हूँ बरसों से.. की बेटिया तो घर की शान होगी
,
पर किसने सोचा था की .. आते ही उनकी जिंदगी मौत के नाम होगी !


यूँ तो देवी बना पूजा करते हो मंदिरों में
,
फिर क्यूँ दिखाई देती है हमें वो कचरे के ढेरो में !


राहगीरों का मन भी पसीज उठता हैं
,
जब तुम्हारे अंश क टुकड़े को कुत्ता खाता हैं !


रे निर्लज मानव..कैसे तू ये खता कर लेता है
,
अपने ही अंश के टुकड़े को जुदा कर लेता है
?

बेटी से अगर इतनी ही नफरत है तो फिर क्यूँ पूजा करता हैं
, 
क्यूँ औलाद की उम्मीद में देवी के दर दर तू भटकता हैं !!


अरे !! बेटे तो अपने हो कर भी पराये से हैं
,
पर बेटियों ने तो पराई हो कर भी दो दो घर बसाए हैं !


नारी न होती तो तुम दुनियां में कैसे आते
,
कैसे अपनी माँ के आँचल से यु लिपट जाते !!


विनाशकाले विपरीत बुद्धि का कथन सत्य ही समझो
,
आज देवी का कातिल इंसान ख़तम ही समझो !


एक बेटी का नहीं एक माँ का भी वध करते हो
,
अपने स्वार्थ की खातिर उसका दिल भी नहीं समजते हो !
,
पता चलेगा
, कैसा दर्द होता है उन् कांटो से हुए जख्मो में !!

रे पापियों अब तो तरस खाओ
, कुछ तो रहम करो,
अपने स्वार्थ की खातिर उनको यु ना ख़त्म करो.


इसलिए कहता हूँ यारो बेटियों को धरती पर आने दो
,
उसके पावन कदमो से इस कलयुग को स्वर्ग बन जाने दो. !!



ज़रा खुद को कल्पित करो उन् कंटीले नुकीले झाडो में

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