कन्या
भ्रूण हत्या

सुनता आया हूँ बरसों से.. की बेटिया तो घर की शान होगी ,
पर किसने सोचा था की .. आते ही उनकी जिंदगी मौत के नाम होगी !
यूँ तो देवी बना पूजा करते हो मंदिरों में ,
फिर क्यूँ दिखाई देती है हमें वो कचरे के ढेरो में !
राहगीरों का मन भी पसीज उठता हैं ,
जब तुम्हारे अंश क टुकड़े को कुत्ता खाता हैं !
रे निर्लज मानव..कैसे तू ये खता कर लेता है ,
अपने ही अंश के टुकड़े को जुदा कर लेता है ?
बेटी से अगर इतनी ही नफरत है तो फिर क्यूँ पूजा करता हैं ,
क्यूँ औलाद की उम्मीद में देवी के दर दर तू भटकता हैं !!
अरे !! बेटे तो अपने हो कर भी पराये से हैं ,
पर बेटियों ने तो पराई हो कर भी दो दो घर बसाए हैं !
नारी न होती तो तुम दुनियां में कैसे आते ,
कैसे अपनी माँ के आँचल से यु लिपट जाते !!
विनाशकाले विपरीत बुद्धि का कथन सत्य ही समझो ,
आज देवी का कातिल इंसान ख़तम ही समझो !
एक बेटी का नहीं एक माँ का भी वध करते हो ,
अपने स्वार्थ की खातिर उसका दिल भी नहीं समजते हो ! ,
पता चलेगा , कैसा दर्द होता है उन् कांटो से हुए जख्मो में !!
रे पापियों अब तो तरस खाओ , कुछ तो रहम करो,
अपने स्वार्थ की खातिर उनको यु ना ख़त्म करो.
इसलिए कहता हूँ यारो बेटियों को धरती पर आने दो ,
उसके पावन कदमो से इस कलयुग को स्वर्ग बन जाने दो. !!
ज़रा खुद को कल्पित करो उन् कंटीले नुकीले झाडो में
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