Sunday, 24 March 2013

क्या तुम्हे मैं कभी याद नहीं आया ??

क्या तुम्हे मैं कभी याद नहीं आया ??

किसी गुलाब के खिलने पर भी,
सावन की आहट होने पर भी,
बागो में भीगते हुए,
बारिश में टहलते हुए,
क्या तुम्हे मैं कभी याद नहीं आया ??

आईने में खुद को देखते हुए,
अपने केशुओ को बांधते हुए,
अपने माथे पर बिंदी लगाते हुए,
पावो में पायल बांधते हुए,
तो क्या तुम्हे मैं कभी याद ही नहीं आया ?

यु ही धुप में बैठे हुए,
यु ही आसमान को निहारते हुए,
यु ही चिडियों की चहचाहट सुनते हुए,
यु ही ठंडी हवाए महसूस करते हुए,
तो क्या तुम्हे मैं कभी याद ही नहीं आया ?

कोई किताब पढने पर भी नहीं,
किसी दोस्त से बात करते हुए भी नहीं,
किसी सपने में खोये हुए भी नहीं,
मेरी यादो को याद करते हुए भी नहीं,
तो क्या तुम्हे मैं कभी याद ही नहीं आया ?

चाँद के डूबने पर भी नहीं,
सूरज के निकलने पर भी नहीं,
सावन के आने पर पर भी नहीं,
पतझड़ के जाने पर भी नहीं,
तो क्या तुम्हे मैं कभी याद ही नहीं आया ?

© पुनीत जैन 'चीनू'

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