Zindagi Shayad Isi Ka Naam hai; Pyar, Dard Or Tanhayian.!! M Here To Share My Feelings... Ehsaas Likhta Hu, Ehsaas Samajhta Hu.. Ehsaaso Se Mujhe Pyaar Hai.. Ehsaaso Se Hi CHalta Mera Shabdo Ka Bahav Hai.. !! ♥ Mere Ta'ruf k liye itna hi kehta hu, Apne pyar ke dum par sab k dil me rehta hu !! ♥ © Puneet Jain 'Chinu'
Friday, 26 September 2014
बहुत मजबूर हूँ !!
घर से दूर हूँ, बहुत मजबूर हूँ,
अपनों से दूर हूँ, बहुत मजबूर हूँ !
कुछ पाने की चाहत में चूर हूँ,
अकेला हूँ, क्या करूँ, मजबूर हूँ !
अपनों की भीड़ में एक शुर हूँ,
गैरों के बीच अकेला, मजबूर हूँ !
फौलादी इरादों से भरपूर हूँ,
टूट जाता हूँ खुद से, मजबूर हूँ !
ओढ़ चादर थकन की सो जाता हूँ,
दिलबर का साथ नहीं, मजबूर हूँ !
पी पानी भूख अपनी मिटाता हूँ,
पैसा है जेब में मेरे, पर मजबूर हूँ !
हालातों से किया है हर समझौता,
रिश्तों से कर नहीं पाया, मजबूर हूँ !
जानता हूँ, है दिल मेरा पत्थर सा,
कर नहीं सकता मोम, मजबूर हूँ !
हर एहसास, हर भाव दिल में बसता है,
डरता हूँ जाहिर करने को, मजबूर हूँ !
अपनों से ही तो जीने के अरमान हैं,
जाना चाहता हूँ दूर, पर मजबूर हूँ !
हो गया हूँ मैं अब वक़्त के हवाले,
क्यूंकि... मैं मजबूर हूँ.. बहुत मजबूर हूँ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
अपनों से दूर हूँ, बहुत मजबूर हूँ !
कुछ पाने की चाहत में चूर हूँ,
अकेला हूँ, क्या करूँ, मजबूर हूँ !
अपनों की भीड़ में एक शुर हूँ,
गैरों के बीच अकेला, मजबूर हूँ !
फौलादी इरादों से भरपूर हूँ,
टूट जाता हूँ खुद से, मजबूर हूँ !
ओढ़ चादर थकन की सो जाता हूँ,
दिलबर का साथ नहीं, मजबूर हूँ !
पी पानी भूख अपनी मिटाता हूँ,
पैसा है जेब में मेरे, पर मजबूर हूँ !
हालातों से किया है हर समझौता,
रिश्तों से कर नहीं पाया, मजबूर हूँ !
जानता हूँ, है दिल मेरा पत्थर सा,
कर नहीं सकता मोम, मजबूर हूँ !
हर एहसास, हर भाव दिल में बसता है,
डरता हूँ जाहिर करने को, मजबूर हूँ !
अपनों से ही तो जीने के अरमान हैं,
जाना चाहता हूँ दूर, पर मजबूर हूँ !
हो गया हूँ मैं अब वक़्त के हवाले,
क्यूंकि... मैं मजबूर हूँ.. बहुत मजबूर हूँ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
जिंदगी में बढ़ रही है नादानियाँ.. !!
जिंदगी में बढ़ रही है नादानियाँ,
नित नयी खड़ी हो रही परेशानियाँ !
जाने कैसे बयां करुँ एहसासों को,
होंठो से चिपक बैठी है खामोशियाँ !
भूले भी तो कैसे भूले उनकी बेवफाई,
जर्रे-जर्रे पे छपी है उनकी निशानियाँ !
नफरत करे भी तो करे किस हक़ से ?
इतनी है उनकी हम पर मेहरबानियाँ !
कैसे फाड़े इश्क़ की किताबों के वो पन्ने ?
हो चुकी है आम हमारे इश्क़ की कहानियाँ !
इन्तजार है..कोई तो फैला दे रोशनियाँ,
नित नयी अब खड़ी हो रही परेशानियाँ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
नित नयी खड़ी हो रही परेशानियाँ !
जाने कैसे बयां करुँ एहसासों को,
होंठो से चिपक बैठी है खामोशियाँ !
भूले भी तो कैसे भूले उनकी बेवफाई,
जर्रे-जर्रे पे छपी है उनकी निशानियाँ !
नफरत करे भी तो करे किस हक़ से ?
इतनी है उनकी हम पर मेहरबानियाँ !
कैसे फाड़े इश्क़ की किताबों के वो पन्ने ?
हो चुकी है आम हमारे इश्क़ की कहानियाँ !
इन्तजार है..कोई तो फैला दे रोशनियाँ,
नित नयी अब खड़ी हो रही परेशानियाँ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Friday, 22 August 2014
थोड़ी तो पीने दे !
मिटा चूका हूँ लकीरे दर्द की;
सुकून से कुछ पल तो जीने दे,
बंद होने को है अब मयखाना,
यादों में उसकी थोड़ी तो पीने दे !
बसा चूका हूँ लहुँ में उसको;
चैन से उसको रगों में बहने दे,
हो गयी है ये सांसें भी नशीली;
रोकने को उन्हें थोड़ी तो पीने दे !
ख्वाबों में ख़यालों में बस तुम्ही हो;
काश! कुछ पल तो हकीकत होने दे,
पार हुई अब इंतजार की बेइंतेहा हदें,
करने को हकीकत थोड़ी तो पीने दे !
ख्वाबों से अब हकीकत हुई;
जिंदगी तेरे नाम की जीने दे,
भूलने को अपने दर्द-ओ-गम;
आखिरी बार.. थोड़ी तो पीने दे !
© पुनीत जैन 'चीनू'
सुकून से कुछ पल तो जीने दे,
बंद होने को है अब मयखाना,
यादों में उसकी थोड़ी तो पीने दे !
बसा चूका हूँ लहुँ में उसको;
चैन से उसको रगों में बहने दे,
हो गयी है ये सांसें भी नशीली;
रोकने को उन्हें थोड़ी तो पीने दे !
ख्वाबों में ख़यालों में बस तुम्ही हो;
काश! कुछ पल तो हकीकत होने दे,
पार हुई अब इंतजार की बेइंतेहा हदें,
करने को हकीकत थोड़ी तो पीने दे !
ख्वाबों से अब हकीकत हुई;
जिंदगी तेरे नाम की जीने दे,
भूलने को अपने दर्द-ओ-गम;
आखिरी बार.. थोड़ी तो पीने दे !
© पुनीत जैन 'चीनू'
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !
मौसम खुशनुमा है, शाम होने की देर है,
करीब है वो हमारे, गले लगाने की देर है,
हो जाएगा ये आलम भी नशीला-नशीला,
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !
फ़िज़ा में मदहोशी है, सितारों के आने की देर है,
शमा भी महक जाएगी, चाँद के आने की देर है,
चढ़ जाएगा हमें भी सुरूर मोहब्बत का हौले-हौले,
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !
हाथों में है जान हमारे, बस दीदार की देर है,
लिखी है किस्मत लहू से, उनके हां की देर है,
एक हो जाएंगे मिलन के जाम एक-दुझे से,
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Wednesday, 20 August 2014
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
जीवन की नैया है बीच मझधार...
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
न मंजिल का पता है ना सारथी कोई,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
मिले थे दिल जिनसे, टूटे है अब वो,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
बुझाई है उम्मीदों की शमा खुद से,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
अपने सपनों को कुचला औरों की खातिर,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
दिल में एहसासों को अपने दफन किया,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
जीता हूँ औरों के लिए, खुद के लिए नहीं,
शायद इसीलिए मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
© पुनीत जैन 'चीनू'
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
न मंजिल का पता है ना सारथी कोई,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
मिले थे दिल जिनसे, टूटे है अब वो,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
बुझाई है उम्मीदों की शमा खुद से,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
अपने सपनों को कुचला औरों की खातिर,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
दिल में एहसासों को अपने दफन किया,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
जीता हूँ औरों के लिए, खुद के लिए नहीं,
शायद इसीलिए मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Friday, 1 August 2014
मिलन की आस.. फिर से एक बार.. !!
कैसे पूछूं रातों के वो फ़साने,
नहीं मिलते बातों के वो बहाने,
प्यार की रौशनी बुझ सी गयी,
अब नहीं आतें सपने वो सुहाने !
खलती है कमी उन बिखरी जुल्फों की,
हाथों से मिटानी पड़ती है दास्ताँ टीके की,
वो चादर में नहीं आती अब सिलवटें,
आदत हो गयी है, तकिये से आंसू पोछने की !
मौसम जो बरसातों के फिर से आएं,
दिल में यादों की आग फिर लगायें,
इन्ही मौसमों ने खंजर है चुभाएं,
तुमसे लिपटने में दिल अब घबराएं !
फूल हमारी यादों के मुरझायें,
बातें..वादें... नश्तर है चुभायेें,
ये वक़्त का फेर ही तो है जानेजाना,
बेदर्दी से एक-दुझे का हाथ है छुडाएं!
वो झूठा गुस्सा सच्चा हो गया,
मनाने का मेरा हक़ ख़त्म हो गया,
वो वादे, वो कसमे,वो प्यार तेरा,
सब कुछ बेगाना सा हो गया !
इतना दूर न करो मुझे खुदसे,
रह नहीं पाउँगा अब दूर तुमसे,
रिश्तें को फिर से हसीं नाम दे,
जर्रा-जर्रा दिल का जुड़ा है तुमसे !
© पुनीत जैन 'चीनू'
नहीं मिलते बातों के वो बहाने,
प्यार की रौशनी बुझ सी गयी,
अब नहीं आतें सपने वो सुहाने !
खलती है कमी उन बिखरी जुल्फों की,
हाथों से मिटानी पड़ती है दास्ताँ टीके की,
वो चादर में नहीं आती अब सिलवटें,
आदत हो गयी है, तकिये से आंसू पोछने की !
मौसम जो बरसातों के फिर से आएं,
दिल में यादों की आग फिर लगायें,
इन्ही मौसमों ने खंजर है चुभाएं,
तुमसे लिपटने में दिल अब घबराएं !
फूल हमारी यादों के मुरझायें,
बातें..वादें... नश्तर है चुभायेें,
ये वक़्त का फेर ही तो है जानेजाना,
बेदर्दी से एक-दुझे का हाथ है छुडाएं!
वो झूठा गुस्सा सच्चा हो गया,
मनाने का मेरा हक़ ख़त्म हो गया,
वो वादे, वो कसमे,वो प्यार तेरा,
सब कुछ बेगाना सा हो गया !
इतना दूर न करो मुझे खुदसे,
रह नहीं पाउँगा अब दूर तुमसे,
रिश्तें को फिर से हसीं नाम दे,
जर्रा-जर्रा दिल का जुड़ा है तुमसे !
© पुनीत जैन 'चीनू'
'मिलन' की आस...
रिश्ता तुझसे कुछ ख़ास था,मेरे जीने की एक आस था !
वक़्त-बेवक़्त होती थी तुझसे बातें,
ख्वाबों में होती थी रोज मुलाकातें !
हाँ... वो वक़्त कितना अच्छा सा था,
सब कुछ सच्चा-सच्चा सा था !
एक-दुझे की बात को बिन कहे समझ लेते,
बिना बात के ही खिल-खिलाकर हंस लेते !
वो बात करने के बस बहाने ढूंढना,
वो हंसना-रोना, रूठना-मनाना !
दोस्ती कब प्यार में बदली पता ही न चला,
पाकर आँचल तेरा, सुकून से मैं बावरा हो चला !
वो दोस्ती, वो रिश्तेदारी कुछ अजब सी थी,
प्यार में हमारे वफ़ादारी कुछ गजब सी थी !
वो ख्वाबों की बातें तड़पाने लगी थी,
वो मीलों की दुरी सताने लगी थी !
वक़्त एक ऐसा आया, मिलने का मोड़ आया,
पर हाय रे किस्मत...जिंदगी ने ये क्या मोड़ खाया ??
वो दिन भर की बातें, वो अनगिनत यादें..
सब कुछ हवा हो गयी,
ना जाने किन बातों से मेरी जान,
मुझसे रुस्वा हो गयी !
रिश्ता हमारा... कांच सा टूट सा गया था,
साथ हमारा... हाथों से छूट सा गया था !
अब तो बस... यादें ही बची थी,
मिलन की उनसे फरियादें ही बची थी !
हर कोशिश की उनसे गुफ्तगू करने की,
कसक न छोड़ी कोई नफरत करने की !
टुटा...बेदर्दी से... सब कुछ फना-फना सा था,
निकला जब आगे... अँधेरा घना-घना सा था !
वक़्त-औ-हालातों की राहों पर चलता चला,
कोशिश उनसे मिलने की मैं करता चला !
दौर आये ज़िंदगी में कुछ ऐसे,
बात हुई उनसे..
पर लगा है कोई जिन्दा लाश जैसे !
लिखकर नाम उनके मैं मिटाता चला,
मैं टुटा इस कदर की छुपाता चला !
वक़्त के बदलाव के साथ उम्मीदे जगने लगी,
यादों की आग दोतरफा जलने लगी !
कुछ बहानों से फिर मुलाकात होने लगी,
इन्तजार में उसके... शाम होने लगी !
साथ ने उनके...सब कुछ उगला दिया,
इस पत्थर को फिर से पिघला दिया !
कर दिया 'चीनू' को खड़ा फिर उसी चौराहे पर,
'मिलन' की आस में खड़ा किया था जहाँ पर !
हाँ... आज भी बाहें फैलाएं खड़ा हूँ वहीँ पर..
एक बार.. बस एक बार फिर से चली आआअ ....
मिल जाएगी... तुझे-मुझे फिर से जिंदगी,
एक बार.. बस एक बार फिर से चली आआअ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Friday, 18 July 2014
कसक दिल की !!
सुनो ना...
आज भी करता हूँ
इन्तजार...
जिंदगी के
उसी दोराहे पर
जहाँ
कुचले थे
मैंने
एक-दुझे के अरमान
कर दिया था
नेस्तनाबूद
एक-दुझे की शक्शियत को !
आतुर था तुम्हे पाने को
व्याकुल था...
तुमको खोने से
और
उसी आतुरता, व्याकुलता में
कुचल दिया
तुम्हारे अस्तित्व को !
और
कुछ पलों की
खुशियाँ देकर,
लूट ली थी
आबरू तुम्हारी...
सरेराह !
नहीं भुला हूँ
एक पल को भी
तुम्हारे दामन पर
तेज़ाब जो गिराया था,
तुम्हे आत्मा से
झुलसाया था,
पर यकीं मानो
वक़्त के हाथों मजबूर था,
हालाँकि...
मैं तुमसे दूर था,
पर रिश्ता तुमसे
करीबी का था !
उसी रिश्ते के
नाम को नफरत में
बदल दिया,
और
तुमको सभी रिश्तों से
दूर कर दिया !
सजा मेरे
उन गुनाहों की
आज भी मांगता हूँ,
दे दो मुझे सजा-ऐ-मौत,
पर मेरे दामन में
अपनी ख़ामोशी का
फंदा ना डालो !
ये ख़ामोशी ही है,
जिसने उथल-पुथल
थी मचाई,
और मुझसे
तुम्हारी
जान पर
बन आई !
हाँ... आज भी
मलाल है मुझे
अपनी उन
हरकतों का,
जिससे
नीचा तुमको
देखना पड़ा,
अफ़सोस है
दिल से,
मेरे गुस्से से
तुमको जलना पड़ा,
पर यकीं मानो,
दिल से हमेशा
तुमको
खुशियाँ ही
देनी चाही थी !
यातनाएँ मेरी
हज़ार सही तुमने,
लब से तुम्हारे हमेशा,
लाखो दुआएं ही निकली !
आज फिर से...
उन्ही दुआओं की
भीख मांगता हूँ,
एक दुआ में
फिर से उम्मीद लिख दो,
फिर से वो साथ लिख दो !
जिंदगी के
कई साल गुजरे
पर लगता है
जैसे कल की ही
बात हो !
सुनो ना..
एक बार तो
इस तड़पते दिल की
आवाज सुनो ना !
नहीं फिर से चाहता,
खुशियाँ तुम्हारी उजाड़ना,
पर,
अब और नहीं रह सकता,
तुम्हारे बिना,
चुभती है
ये ख़ामोशी,
मारती है पल-पल !
लौट आओ ना
कर रहा हूँ
इन्तजार उसी दोराहे पर,
जहाँ छीना था साथ,
आज वही पर
फिर से
मांगता हूँ
साथ तुम्हारा !
वक़्त चाहे थोड़ा सा ले लो,
पर ज़रा बतला दो,
तुम दोगी ना साथ मेरा !
कसक दिल की
पूरी करना चाहता हूँ,
फिर से एक बार
साथ तुम्हारा चाहता हूँ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
आज भी करता हूँ
इन्तजार...
जिंदगी के
उसी दोराहे पर
जहाँ
कुचले थे
मैंने
एक-दुझे के अरमान
कर दिया था
नेस्तनाबूद
एक-दुझे की शक्शियत को !
आतुर था तुम्हे पाने को
व्याकुल था...
तुमको खोने से
और
उसी आतुरता, व्याकुलता में
कुचल दिया
तुम्हारे अस्तित्व को !
और
कुछ पलों की
खुशियाँ देकर,
लूट ली थी
आबरू तुम्हारी...
सरेराह !
नहीं भुला हूँ
एक पल को भी
तुम्हारे दामन पर
तेज़ाब जो गिराया था,
तुम्हे आत्मा से
झुलसाया था,
पर यकीं मानो
वक़्त के हाथों मजबूर था,
हालाँकि...
मैं तुमसे दूर था,
पर रिश्ता तुमसे
करीबी का था !
उसी रिश्ते के
नाम को नफरत में
बदल दिया,
और
तुमको सभी रिश्तों से
दूर कर दिया !
सजा मेरे
उन गुनाहों की
आज भी मांगता हूँ,
दे दो मुझे सजा-ऐ-मौत,
पर मेरे दामन में
अपनी ख़ामोशी का
फंदा ना डालो !
ये ख़ामोशी ही है,
जिसने उथल-पुथल
थी मचाई,
और मुझसे
तुम्हारी
जान पर
बन आई !
हाँ... आज भी
मलाल है मुझे
अपनी उन
हरकतों का,
जिससे
नीचा तुमको
देखना पड़ा,
अफ़सोस है
दिल से,
मेरे गुस्से से
तुमको जलना पड़ा,
पर यकीं मानो,
दिल से हमेशा
तुमको
खुशियाँ ही
देनी चाही थी !
यातनाएँ मेरी
हज़ार सही तुमने,
लब से तुम्हारे हमेशा,
लाखो दुआएं ही निकली !
आज फिर से...
उन्ही दुआओं की
भीख मांगता हूँ,
एक दुआ में
फिर से उम्मीद लिख दो,
फिर से वो साथ लिख दो !
जिंदगी के
कई साल गुजरे
पर लगता है
जैसे कल की ही
बात हो !
सुनो ना..
एक बार तो
इस तड़पते दिल की
आवाज सुनो ना !
नहीं फिर से चाहता,
खुशियाँ तुम्हारी उजाड़ना,
पर,
अब और नहीं रह सकता,
तुम्हारे बिना,
चुभती है
ये ख़ामोशी,
मारती है पल-पल !
लौट आओ ना
कर रहा हूँ
इन्तजार उसी दोराहे पर,
जहाँ छीना था साथ,
आज वही पर
फिर से
मांगता हूँ
साथ तुम्हारा !
वक़्त चाहे थोड़ा सा ले लो,
पर ज़रा बतला दो,
तुम दोगी ना साथ मेरा !
कसक दिल की
पूरी करना चाहता हूँ,
फिर से एक बार
साथ तुम्हारा चाहता हूँ !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Sunday, 29 June 2014
अबके सावन पहले-सी वो बरसात हो !!
अबके सावन पहले-सी वो बरसात हो,
दिल में तेरे-मेरे फिर वही ज़ज़्बात हो !
भीगने के बहाने कहीं तो मुलाकात हो,
इन बूंदों में कुछ तो शह और मात हो !
साथ चलने के बहाने कुछ तो बात हो,
कड़कती बिजलियों से कुछ तो खुराफात हो !
दिल में तेरे, मिलन के कुछ तो खयालात हो,
तपती दिल की जमीं पर नीर-सी सौगात हो !
भीगे केशुओं से खुशबू की कुछ तो शराफ़ात हो,
नजरों की मदहोश शबनम से एक पल बात हो !
दुआ है खुद से कुछ तो ऐसी इनायत हो,
अबके सावन पहले-सी फिर वो बरसात हो !
© पुनीत जैन 'चीनू '
दिल में तेरे-मेरे फिर वही ज़ज़्बात हो !
भीगने के बहाने कहीं तो मुलाकात हो,
इन बूंदों में कुछ तो शह और मात हो !
साथ चलने के बहाने कुछ तो बात हो,
कड़कती बिजलियों से कुछ तो खुराफात हो !
दिल में तेरे, मिलन के कुछ तो खयालात हो,
तपती दिल की जमीं पर नीर-सी सौगात हो !
भीगे केशुओं से खुशबू की कुछ तो शराफ़ात हो,
नजरों की मदहोश शबनम से एक पल बात हो !
दुआ है खुद से कुछ तो ऐसी इनायत हो,
अबके सावन पहले-सी फिर वो बरसात हो !
© पुनीत जैन 'चीनू '
Thursday, 24 April 2014
साथिया ये तूने क्या किया !!
साथिया ये तूने क्या किया,
प्यार को मेरे फना किया,
बेताबी बेकरारी थी प्यार में,
तूने फिर क्यूँ उसे रुस्वा किया !
हमनवा ये तूने क्या किया,
देकर सब कुछ छीन लिया,
क्या कसक थी प्यार में मेरे ?
एहसासों से मेरे शिकवा किया !
© पुनीत जैन 'चीनू'
प्यार को मेरे फना किया,
बेताबी बेकरारी थी प्यार में,
तूने फिर क्यूँ उसे रुस्वा किया !
हमनवा ये तूने क्या किया,
देकर सब कुछ छीन लिया,
क्या कसक थी प्यार में मेरे ?
एहसासों से मेरे शिकवा किया !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Tuesday, 22 April 2014
घर से निकलते ही एक तेरा ख़याल आता है !!
घर से निकलते ही एक तेरा ख़याल आता है,
चंद कदम बढ़ाते ही रास्तों का सैलाब आता है,
मंजिल की कश्मकश में होशों हवास खो बैठा हूँ,
अब तो ऐ दिलरुबा बतला दे ... किस रास्ते पर तेरा मकान आता है !
आँखे जो बंद करू तो तेरा नशा-सा छाता है,
ख्वाब जो टूटे तो धुँआ धुँआ नजर आता है,
बंद कमरे मैं बैठा तेरी खुशबू महसूसता हूँ,
खिड़की जो खोलूँ तो तेरा साया नजर आता हैं !
© पुनीत जैन 'चीनू'
चंद कदम बढ़ाते ही रास्तों का सैलाब आता है,
मंजिल की कश्मकश में होशों हवास खो बैठा हूँ,
अब तो ऐ दिलरुबा बतला दे ... किस रास्ते पर तेरा मकान आता है !
आँखे जो बंद करू तो तेरा नशा-सा छाता है,
ख्वाब जो टूटे तो धुँआ धुँआ नजर आता है,
बंद कमरे मैं बैठा तेरी खुशबू महसूसता हूँ,
खिड़की जो खोलूँ तो तेरा साया नजर आता हैं !
© पुनीत जैन 'चीनू'
Thursday, 3 April 2014
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना... तुम्हे बेपनाह चाहता हूँ,
हर पल तुम्हे आँखों में समाता हूँ,
हंसी को तुम्हारी लबों पर बसाता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना...एहसास तुम्हे मानता हूँ,
प्रीत के मीठे शब्दों में तुम्हे ढ़ालता हूँ,
ग़ज़लों में अपनी... तुम्हे गुनगुनाता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना...हरपल तुम्हे पास रखता हूँ,
ख्वाबों में हाथ तुम्हारा थामे रखता हूँ,
तुम संग जिंदगी जीने कि आस रखता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना...
थामना चाहता हूँ सातों जन्म तुम्हारा हाथ,
अब तो बतला दो...
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
© पुनीत जैन 'चीनू'
हर पल तुम्हे आँखों में समाता हूँ,
हंसी को तुम्हारी लबों पर बसाता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना...एहसास तुम्हे मानता हूँ,
प्रीत के मीठे शब्दों में तुम्हे ढ़ालता हूँ,
ग़ज़लों में अपनी... तुम्हे गुनगुनाता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना...हरपल तुम्हे पास रखता हूँ,
ख्वाबों में हाथ तुम्हारा थामे रखता हूँ,
तुम संग जिंदगी जीने कि आस रखता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
सुनो ना...
थामना चाहता हूँ सातों जन्म तुम्हारा हाथ,
अब तो बतला दो...
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?
© पुनीत जैन 'चीनू'
Subscribe to:
Posts (Atom)



.jpg)
.jpg)




