Thursday, 28 November 2013

तुझसे मुलाकात हो !!


काश... ये मचलता समां रोज हो,
बारिशों के बहाने तुझसे मुलाकात हो !

तू भी हो.. मैं भी होऊ... और जन्नत हो,
इशारों इशारों में यार कभी तो बात हो !

घुमने निकलूं भीगने के बहाने,
उस मोड़ पर कभी तो साथ हो !

भूल आऊं अपनी छतरी घर पर,
उसकी छतरी के नीचे कभी तो रात हो !

देखता रहूँ तेरे भीगे केशुओं को,
तेरी आँखों से मेरी भी तो मात हो !

धरती-नीर सा साथ हो जाएँ अपना,
इस ज़माने में ऐसी भी तो शराफत हो !

बदल दूं अपने सपनों को हकीकत में,
संग तेरे-मेरे कभी ऐसी भी बरसात हो !

© Puneet Jain 

Kavi Puneet Jain 'Chinu' - Ehsaaso Ka Kavi

Tuesday, 26 November 2013

बंद खिड़की से बाहर मैं झांकता रहता हूँ !!

खाली रातों में छत को मैं तांकता रहता हूँ,
बंद खिड़की से बाहर मैं झांकता रहता हूँ !

आस - पास अपने लोगों को ढूँढता रहता हूँ,
गलियारे में इसीलिए मैं घूमता रहता हूँ !

खिलखिलाहटों से मैं ये कहाँ आ गया हूँ ?
रब से फिर वही नसीब मांगता रहता हूँ !

ना दिन का होश हैं, ना रातों की परवाह,
बस यूं ही  खुद ही खुद में खोया रहता हूँ !

सफ़र शुरू होता हैं रोज एक सा जिंदगी का,
सोचता हूँ क्यूँ मैं रोज खुशियां मांगता रहता हूँ !

कहते हैं मंजिले तो हाथों की लकीरों में होती हैं,
उठकर रोज सुबह हाथों को अपने देखता रहता हूँ !!

© पुनित जैन 'चीनू' 

Sunday, 24 November 2013

वक़्त और खुशियां !!

** वक़्त और खुशियां **

सुनो ना...
कल एक मुलाकात हुई...
... वक़्त से !

बोला...
रे कहाँ था तू,
कितना ढूंढा तुझे,
पर हर बार..
वक़्त के फेर से तू आगे निकल गया !

हर पल... हर लम्हे...
तुझे कुछ देने की कोशिश की,
पर
तू तो बस सबको देने में ही लगा था !

ले... आज में तेरे हिस्से में आता हूँ,
ले... आज में तेरा नसीब बदलता हूँ !

ये वक़्त भी बड़ी अजीब चीज है,
कब, कहाँ, किस मोड़ पर बदल जाएँ
कोई नहीं जानता
पर
हर मोड़ पर
छोड़ देता हैं... अपनी निशानियां...
कुछ वादें,
कुछ ना भूलने वाली यादें,
दे जाता हैं मन में
ढेरों खुशियां, ढेरों सपने...
पर
कोई नहीं जानता...
कि ये कब बदल जाएँ...
मिलन की वेला विदाई बन जाएँ
और
दुखों के समंदर में...
खुशियों की बरखा हो जाएँ !

ये तो बस इतना जानता हैं...
जिसने
वक़्त के हर स्वरुप को
समझ लिया, जी लिया
वक़्त उसका हो लिया...
और
मैं तो बस इतना जानूं...
कि वक़्त जिसका हो लिया...
उसने सबकुछ पा लिया !

यही सोचकर...
मैंने भी
इसको समझने का
सोचा हैं,
सब कुछ पाने का ठाना हैं,
मेरे इस सपने में
तुम दोगी ना साथ मेरा....... !!!!

बताओ ना...

© पुनित जैन 'चीनू'

Saturday, 24 August 2013

बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं !!!

बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
क्या मेरे जेहन में कुछ आया नहीं ?

बड़े दिनों से कुछ सीखा नहीं,
क्या समाज में कुछ देखा नहीं ?

बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
क्या प्रेम का अंकुर फूटा नहीं ?

बड़े दिनों से कुछ सीखा नहीं,
क्या नफरत का बीज बोया नहीं ?

हाँ... बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
शायद दुनिया से इन दिनों कुछ सिखा नहीं !

© पुनित जैन 'चीनू'

Friday, 23 August 2013

तब गुजर जाते थे दिन, तेरी एक हंसी के सहारे !!

अब तो तेरे दीदार से भी जी नहीं भरता,
तब गुजर जाते थे दिन, तेरी एक हंसी के सहारे !!

© पुनित जैन 'चीनू'

Wednesday, 14 August 2013

Happy Independence Day !!

ऐ भारत माँ तेरे सजदे सर झुकाता हूँ,
आज बलिवेदी पर हिन्दुस्तान गुंजाता हूँ,
रक्त नहीं अपने शब्दों के तीर चलाता हूँ,
आजादी का गीत अपनी कलम से गाता हूँ !

© पुनित जैन 'चीनू'

Ae Bharat Maa Tere Sajde Sir Jhukata Hoon,
Aaj Balivedi Par Hindustaan Gunjata Hoon,
Rakt Nahi Apne Shabdon Ke Teer Chalata Hoon,
Aajadi Ka Geet Apni Kalam Se Gaata Hoon !!

© Puneet Jain 'Chinu'

Friday, 14 June 2013

रिमझिम बरखा

हाँ !!
मुझे आज भी याद है
वो हमारी पहली मुलाकात
और
वो सुरमई सी सांझ !

हाँ !!
मुझे आज भी याद है
हमारा मिलन
और
रिमझिम बरखा का आगमन !

हाँ !!
मुझे आज भी याद है
वो दिन
जब हम पहली बार
भीगे थे बरसात में
हाथ थे एक दुझे के हाथ में
ख़ुशी थी इस बात की,
कि हम है साथ में !

हाँ !!
जैसे ही बरसी आज
सावन की पहली फुहार,
वो मिलन की यादें
ताजा हो आई

और !!
इन शीत बयारों से
तेरी खुशबू है आई
भिगों कर अपने प्रेम-जल में
फिर अपनी याद है दिलाई !

पर !!
यह तो सिर्फ बहाना है
तुझे याद करने का
जब-जब सोचता हूँ तुझको
तब-तब भीग उठता है मन
तेरे प्रेम और यादों की बरखा में !
जानती हो !!
अपने हर एक लम्हे को
दिल में बसाया है ऐसे
समाती हैं बारिश की
पहली फुहार धरती में जैसे !

सुनो ना !!
आज फिर उस मिलन को
एक बार जी लेने दो,
और फिर से ‘चीनू’ को
अपने प्रेम-जल में भीग जाने दो !

Wednesday, 12 June 2013

पड़ी आज सावन की पहली फुहार है !

पड़ी आज सावन की पहली फुहार है,
देखो दिल में छाई खुशियों की बहार है !

तरह रही थी कब से ये धरती,
दिल की बगिया कब तक यूं रहती !

वो देखो.. काली काली घटा है छाई,
अहा.. ठंडी – ठंडी पुरवाई है आई !

वो मस्त हुआ बावरा आसमान,
झूम उठा मेरा तन बदन !

पानी नहीं प्यार है बरसा रही,
जोर से बरस.. क्यूँ और तरसा रही !

प्यार की तड़प में ही जानूं,
इतनी सी बूंदों में कैसे मानूँ !

अब तो आजा.. गागर छलका जा,
इस बरखा में, मुझको भिगों जा !

तरस रहा हूँ, तड़प रहा हूँ कब से,
अब तो आजा..मिल जा मुझसे !

कहता चीनू पुकारे कोई दिल से,
बरखा बहती नैन अम्बर से !

बहुत हुआ खेल अब तो ये,
बरस जा अब घनघोर गगन से !!

© Puneet Jain 'Chinu'

Sunday, 9 June 2013

लगा जैसे... !!!

सुनो !! कल ये ठंडी हवाएं कुछ कह रही थी,
लगा जैसे, शायद तुम्हारी याद दिला रही थी !

शब् की ठंडी बयारों ने कुछ ऐसे जकड रखा था,
लगा जैसे, शायद तुमने दिल को मेरे पकड़ रखा था !

वो शब् की आगोश में चांदनी खिलखिला रही थी,
लगा जैसे, हंसी तुम्हारी चहचहा रही थी !

वो तेज हवाओं से पत्ते नाच रहे थे,
लगा जैसे, हमारा प्रेम राग गा रहे थे !

हुआ उन फिजाओं का फिजाओं से मिलन,
की मौसम हुआ मस्ताना, रही न कोई शिकन !

आया तो था मिटाने को अपनी तन्हाई,
लगा जैसे, यादों की बज रही थी शहनाई !

ये हवाएं, ये यादें ही तो 'चीनू' का सहारा हैं,
जो जी लूं इनको तो जिन्दगी मेरी बहारा हैं !

Sunday, 24 March 2013

दहेज़ !!


दहेज़ !!

आज फिर मेरा कलेजा चिर गया,
दहेज़ का दानव फिर किसी की जान लील गया.


एक लड़की.. शादी कर अनजाने घर वो आती है
,
बहु नहीं
, एक बेटी बनने की कोशिश करती है.

फिर ऐसा क्यूँ होता है
, पैसो से क्यूँ उसका मोल आँका जाता है,

दहेज़ की खातिर क्यूँ उसे प्रताड़ित किया जाता है.


क्या होता होगा जब उसके माँ-बाप को पता चलता होगा
,
देख बेटी की ये दशा
कलेजा मुह को आता होगा.

क्यूँ तुम्हे बहु से नहीं
, पैसो से प्यार है,
पति का भी देखो कितना कठोर व्यवहार है.


जरा सोचो.. तुमने भी तो बेटी जनी है.

वो भी तो किसी घर की बहु बननी है
 

कल को उसके साथ भी ऐसा होगा
,
क्या तुमसे वो सहन होगा
,

अरे .. अब तो संभलो !! इस दहेज़ के दानव को रोको.

अपने लालच की खातिर मत किसी को आग में झोंको.


तुम्हारी बहु भी तो किसी की बहिन
, किसी की बेटी है,
अब भी न संभाले तो इस दहेज़ की आग में तुम्हारी बेटी हैं !!

मेरी बहना !!!


मेरी बहना !!!

रो उठता हैं दिल जब याद तुम्हारी आती हैं,
रिश्ते होकर भी क्यू परायेपन की दीवार आती हैं !

जानता हूँ बड़ी मुश्किल से खुद को अलग किया होगा,
सीने पर पत्थर बड़ा रख लिया होगा,
सच कहता हूँ, लोगो की बातो में आगयी तुम बहना,
अपने भाई को तुम पहचान ना पायी बहना !

पर सच मानो बहना..
हर पल तुमको अपना माना था,
इस पवित्र धागे को खुदा का वरदान माना था,
खुद को खुशनसीब समझा था !

लेकिन रिश्ते की दूर कमजोर निकल गयी,
वक़्त और हालत से कोशिशे हार गयी,
दुनिया की गलतफेहमियो से तुम दूर हो गयी,
और इस तरह एक भाई की कलाई सुनी हो गयी !

जानता हूँ वो वक़्त आएगा,
वो धागा मेरी कलाई पर सज जाएगा,
आज भी खुदा से दुआ करता हूँ,
हर जन्म तुम्ही को बहन मांगता हूँ !!

मोहब्बत की है मैंने !!


मोहब्बत की है मैंने !!

तेरी हर सांस से मोहब्बत की है मैंने,
तेरे हर एहसास से मोहब्बत की है मैंने !

तू मेरे पास नहीं फिर भी तेरी यादो से मोहब्बत की है मैंने,
जो साथ बिताये थे लम्हे, उन लम्हों से मोहब्बत की है मैंने !

जिन हवाओं ने तुझको छुआ, उनसे मोहब्बत की हैं मैंने,
जिस खुशबू ने तुझको महकाया, उससे मोहब्बत की हैं मैंने !हकायाyaसे मोहब्बत की हैं मैंने

तेरी पायल की झंकार से मोहब्बत की है मैंने,
तेरी चूड़ी की खनक से मोहब्बत की हैं मैंने !

तू दूर सही, मजबूर सही, फिर भी तुझसे मोहब्बत की है मैंने,
खुद से भी ज्यादा तुझसे मोहब्बत की है मैंने !!

रिश्तो की हकीकत !!!

रिश्तो की हकीकत !!!

रिश्तो की हकीकत बस यह है की मतलब की लिए रिश्ते बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की वक़्त गुजारने के लिए रिश्ते बनते है,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की पैसो के लिए रिश्ता बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की तनहा छोड़ने के लिए रिश्ते बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की गम देने क लिए रिश्ते बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की तोड़ने के लिए ही रिश्ते बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की खेल खेलने क लिए रिश्ते बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की मायूस करने के लिए रिश्ते बनते हैं,
रिश्तो की हकीकत बस यह है की कुछ पलो के लिए रिश्ते बनते हैं !!!