खाली रातों में छत को मैं तांकता रहता हूँ,
बंद खिड़की से बाहर मैं झांकता रहता हूँ !
आस - पास अपने लोगों को ढूँढता रहता हूँ,
गलियारे में इसीलिए मैं घूमता रहता हूँ !
खिलखिलाहटों से मैं ये कहाँ आ गया हूँ ?
रब से फिर वही नसीब मांगता रहता हूँ !
ना दिन का होश हैं, ना रातों की परवाह,
बस यूं ही खुद ही खुद में खोया रहता हूँ !
सफ़र शुरू होता हैं रोज एक सा जिंदगी का,
सोचता हूँ क्यूँ मैं रोज खुशियां मांगता रहता हूँ !
कहते हैं मंजिले तो हाथों की लकीरों में होती हैं,
उठकर रोज सुबह हाथों को अपने देखता रहता हूँ !!
© पुनित जैन 'चीनू'
बंद खिड़की से बाहर मैं झांकता रहता हूँ !
आस - पास अपने लोगों को ढूँढता रहता हूँ,
गलियारे में इसीलिए मैं घूमता रहता हूँ !
खिलखिलाहटों से मैं ये कहाँ आ गया हूँ ?
रब से फिर वही नसीब मांगता रहता हूँ !ना दिन का होश हैं, ना रातों की परवाह,
बस यूं ही खुद ही खुद में खोया रहता हूँ !
सफ़र शुरू होता हैं रोज एक सा जिंदगी का,
सोचता हूँ क्यूँ मैं रोज खुशियां मांगता रहता हूँ !
कहते हैं मंजिले तो हाथों की लकीरों में होती हैं,
उठकर रोज सुबह हाथों को अपने देखता रहता हूँ !!
© पुनित जैन 'चीनू'
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