
काश... ये मचलता समां रोज हो,
बारिशों के बहाने तुझसे मुलाकात हो !
तू भी हो.. मैं भी होऊ... और जन्नत हो,
इशारों इशारों में यार कभी तो बात हो !
घुमने निकलूं भीगने के बहाने,
उस मोड़ पर कभी तो साथ हो !
भूल आऊं अपनी छतरी घर पर,
उसकी छतरी के नीचे कभी तो रात हो !
देखता रहूँ तेरे भीगे केशुओं को,
तेरी आँखों से मेरी भी तो मात हो !
धरती-नीर सा साथ हो जाएँ अपना,
इस ज़माने में ऐसी भी तो शराफत हो !
बदल दूं अपने सपनों को हकीकत में,
संग तेरे-मेरे कभी ऐसी भी बरसात हो !
© Puneet Jain
Kavi Puneet Jain 'Chinu' - Ehsaaso Ka Kavi
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