Friday, 18 July 2014

कसक दिल की !!


सुनो ना...

आज भी करता हूँ
इन्तजार...
जिंदगी के
उसी दोराहे पर
जहाँ
कुचले थे
मैंने
एक-दुझे के अरमान
कर दिया था
नेस्तनाबूद
एक-दुझे की शक्शियत को !

आतुर था तुम्हे पाने को
व्याकुल था...
तुमको खोने से
और
उसी आतुरता, व्याकुलता में
कुचल दिया
तुम्हारे अस्तित्व को !
और
कुछ पलों की
खुशियाँ देकर,
लूट ली थी
आबरू तुम्हारी...
सरेराह !

नहीं भुला हूँ
एक पल को भी
तुम्हारे दामन पर
तेज़ाब जो गिराया था,
तुम्हे आत्मा से
झुलसाया था,

पर यकीं मानो
वक़्त के हाथों मजबूर था,
हालाँकि...
मैं तुमसे दूर था,
पर रिश्ता तुमसे
करीबी का था !

उसी रिश्ते के
नाम को नफरत में
बदल दिया,
और
तुमको सभी रिश्तों से
दूर कर दिया !

सजा मेरे
उन गुनाहों की
आज भी मांगता हूँ,
दे दो मुझे सजा-ऐ-मौत,
पर मेरे दामन में
अपनी ख़ामोशी का
फंदा ना डालो !

ये ख़ामोशी ही है,
जिसने उथल-पुथल
थी मचाई,
और मुझसे
तुम्हारी
जान पर
बन आई !

हाँ... आज भी
मलाल है मुझे
अपनी उन
हरकतों का,
जिससे
नीचा तुमको
देखना पड़ा,
अफ़सोस है
दिल से,
मेरे गुस्से से
तुमको जलना पड़ा,
पर यकीं मानो,
दिल से हमेशा
तुमको
खुशियाँ ही
देनी चाही थी !

यातनाएँ मेरी
हज़ार सही तुमने,
लब से तुम्हारे हमेशा,
लाखो दुआएं ही निकली !
आज फिर से...
उन्ही दुआओं की
भीख मांगता हूँ,
एक दुआ में
फिर से उम्मीद लिख दो,
फिर से वो साथ लिख दो !

जिंदगी के
कई साल गुजरे
पर लगता है
जैसे कल की ही
बात हो !

सुनो ना..
एक बार तो
इस तड़पते दिल की
आवाज सुनो ना !

नहीं फिर से चाहता,
खुशियाँ तुम्हारी उजाड़ना,
पर,
अब और नहीं रह सकता,
तुम्हारे बिना,
चुभती है
ये ख़ामोशी,
मारती है पल-पल !

लौट आओ ना
कर रहा हूँ
इन्तजार उसी दोराहे पर,
जहाँ छीना था साथ,
आज वही पर
फिर से
मांगता हूँ
साथ तुम्हारा !
वक़्त चाहे थोड़ा सा ले लो,
पर ज़रा बतला दो,
तुम दोगी ना साथ मेरा !

कसक दिल की
पूरी करना चाहता हूँ,
फिर से एक बार
साथ तुम्हारा चाहता हूँ !

© पुनीत जैन 'चीनू'