Friday, 26 September 2014

खंजर !!

दस्तूर यह दुनिया का अब मुझे भी खलता है,
देकर रौशनी, सूरज खुद अपनी आग में जलता है,
यूँ तो हिम्मत कर खेल न सका कोई एहसासों से,
सच ही कहा था किसी-ने,
खंजर मारने वाला भी पहले अपनेपन से मिलता है !

© पुनीत जैन 'चीनू'



बहुत मजबूर हूँ !!

घर से दूर हूँ, बहुत मजबूर हूँ,
अपनों से दूर हूँ, बहुत मजबूर हूँ !

कुछ पाने की चाहत में चूर हूँ,
अकेला हूँ, क्या करूँ, मजबूर हूँ !

अपनों की भीड़ में एक शुर हूँ,
गैरों के बीच अकेला, मजबूर हूँ !

फौलादी इरादों से भरपूर हूँ,
टूट जाता हूँ खुद से, मजबूर हूँ !

ओढ़ चादर थकन की सो जाता हूँ,
दिलबर का साथ नहीं, मजबूर हूँ !

पी पानी भूख अपनी मिटाता हूँ,
पैसा है जेब में मेरे, पर मजबूर हूँ !

हालातों से किया है हर समझौता,
रिश्तों से कर नहीं पाया, मजबूर हूँ !

जानता हूँ, है दिल मेरा पत्थर सा,
कर नहीं सकता मोम, मजबूर हूँ !

हर एहसास, हर भाव दिल में बसता है,
डरता हूँ जाहिर करने को, मजबूर हूँ !

अपनों से ही तो जीने के अरमान हैं,
जाना चाहता हूँ दूर, पर मजबूर हूँ !

हो गया हूँ मैं अब वक़्त के हवाले,
क्यूंकि... मैं मजबूर हूँ.. बहुत मजबूर हूँ !

© पुनीत जैन 'चीनू'




जिंदगी में बढ़ रही है नादानियाँ.. !!

जिंदगी में बढ़ रही है नादानियाँ,
नित नयी खड़ी हो रही परेशानियाँ !

जाने कैसे बयां करुँ एहसासों को,
होंठो से चिपक बैठी है खामोशियाँ !

भूले भी तो कैसे भूले उनकी बेवफाई,
जर्रे-जर्रे पे छपी है उनकी निशानियाँ !

नफरत करे भी तो करे किस हक़ से ?
इतनी है उनकी हम पर मेहरबानियाँ !

कैसे फाड़े इश्क़ की किताबों के वो पन्ने ?
हो चुकी है आम हमारे इश्क़ की कहानियाँ !

इन्तजार है..कोई तो फैला दे रोशनियाँ,
नित नयी अब खड़ी हो रही परेशानियाँ !

© पुनीत जैन 'चीनू'