Friday, 22 August 2014

थोड़ी तो पीने दे !

मिटा चूका हूँ लकीरे दर्द की;
सुकून से कुछ पल तो जीने दे,
बंद होने को है अब मयखाना,
यादों में उसकी थोड़ी तो पीने दे !

बसा चूका हूँ लहुँ में उसको;
चैन से उसको रगों में बहने दे,
हो गयी है ये सांसें भी नशीली;
रोकने को उन्हें थोड़ी तो पीने दे !

ख्वाबों में ख़यालों में बस तुम्ही हो;
काश! कुछ पल तो हकीकत होने दे,
पार हुई अब इंतजार की बेइंतेहा हदें,
करने को हकीकत थोड़ी तो पीने दे !

ख्वाबों से अब हकीकत हुई;
जिंदगी तेरे नाम की जीने दे,
भूलने को अपने दर्द-ओ-गम;
आखिरी बार.. थोड़ी तो पीने दे !

© पुनीत जैन 'चीनू'

बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !


मौसम खुशनुमा है, शाम होने की देर है,
करीब है वो हमारे, गले लगाने की देर है,
हो जाएगा ये आलम भी नशीला-नशीला,
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !

फ़िज़ा में मदहोशी है, सितारों के आने की देर है,
शमा भी महक जाएगी, चाँद के आने की देर है,
चढ़ जाएगा हमें भी सुरूर मोहब्बत का हौले-हौले,
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !

हाथों में है जान हमारे, बस दीदार की देर है,
लिखी है किस्मत लहू से, उनके हां की देर है,
एक हो जाएंगे मिलन के जाम एक-दुझे से,
बस उनके हाथों से जाम छलकने की देर है !

© पुनीत जैन 'चीनू'

Wednesday, 20 August 2014

फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

जीवन की नैया है बीच मझधार...
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

न मंजिल का पता है ना सारथी कोई,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

मिले थे दिल जिनसे, टूटे है अब वो,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

बुझाई है उम्मीदों की शमा खुद से,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

अपने सपनों को कुचला औरों की खातिर,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

दिल में एहसासों को अपने दफन किया,
फिर भी मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

जीता हूँ औरों के लिए, खुद के लिए नहीं,
शायद इसीलिए मुस्कुराहटें..अभी बाकी है !

© पुनीत जैन 'चीनू'

Friday, 1 August 2014

मिलन की आस.. फिर से एक बार.. !!

कैसे पूछूं रातों के वो फ़साने,
नहीं मिलते बातों के वो बहाने,
प्यार की रौशनी बुझ सी गयी,

अब नहीं आतें सपने वो सुहाने !

खलती है कमी उन बिखरी जुल्फों की,
हाथों से मिटानी पड़ती है दास्ताँ टीके की,
वो चादर में नहीं आती अब सिलवटें,
आदत हो गयी है, तकिये से आंसू पोछने की !

मौसम जो बरसातों के फिर से आएं,
दिल में यादों की आग फिर लगायें,
इन्ही मौसमों ने खंजर है चुभाएं,
तुमसे लिपटने में दिल अब घबराएं !

फूल हमारी यादों के मुरझायें,
बातें..वादें... नश्तर है चुभायेें,
ये वक़्त का फेर ही तो है जानेजाना,
बेदर्दी से एक-दुझे का हाथ है छुडाएं!

वो झूठा गुस्सा सच्चा हो गया,
मनाने का मेरा हक़ ख़त्म हो गया,
वो वादे, वो कसमे,वो प्यार तेरा,
सब कुछ बेगाना सा हो गया !

इतना दूर न करो मुझे खुदसे,
रह नहीं पाउँगा अब दूर तुमसे,
रिश्तें को फिर से हसीं नाम दे,
जर्रा-जर्रा दिल का जुड़ा है तुमसे !

© पुनीत जैन 'चीनू'

'मिलन' की आस...

रिश्ता तुझसे कुछ ख़ास था,
मेरे जीने की एक आस था !

वक़्त-बेवक़्त होती थी तुझसे बातें,
ख्वाबों में होती थी रोज मुलाकातें !

हाँ... वो वक़्त कितना अच्छा सा था,
सब कुछ सच्चा-सच्चा सा था !

एक-दुझे की बात को बिन कहे समझ लेते,
बिना बात के ही खिल-खिलाकर हंस लेते !

वो बात करने के बस बहाने ढूंढना,
वो हंसना-रोना, रूठना-मनाना !

दोस्ती कब प्यार में बदली पता ही न चला,
पाकर आँचल तेरा, सुकून से मैं बावरा हो चला !

वो दोस्ती, वो रिश्तेदारी कुछ अजब सी थी,
प्यार में हमारे वफ़ादारी कुछ गजब सी थी !

वो ख्वाबों की बातें तड़पाने लगी थी,
वो मीलों की दुरी सताने लगी थी !

वक़्त एक ऐसा आया, मिलने का मोड़ आया,
पर हाय रे किस्मत...जिंदगी ने ये क्या मोड़ खाया ??

वो दिन भर की बातें, वो अनगिनत यादें..
सब कुछ हवा हो गयी,
ना जाने किन बातों से मेरी जान,
मुझसे रुस्वा हो गयी !

रिश्ता हमारा... कांच सा टूट सा गया था,
साथ हमारा... हाथों से छूट सा गया था !

अब तो बस... यादें ही बची थी,
मिलन की उनसे फरियादें ही बची थी !

हर कोशिश की उनसे गुफ्तगू करने की,
कसक न छोड़ी कोई नफरत करने की !

टुटा...बेदर्दी से... सब कुछ फना-फना सा था,
निकला जब आगे... अँधेरा घना-घना सा था !

वक़्त-औ-हालातों की राहों पर चलता चला,
कोशिश उनसे मिलने की मैं करता चला !

दौर आये ज़िंदगी में कुछ ऐसे,
बात हुई उनसे..
पर लगा है कोई जिन्दा लाश जैसे !

लिखकर नाम उनके मैं मिटाता चला,
मैं टुटा इस कदर की छुपाता चला !

वक़्त के बदलाव के साथ उम्मीदे जगने लगी,
यादों की आग दोतरफा जलने लगी !

कुछ बहानों से फिर मुलाकात होने लगी,
इन्तजार में उसके... शाम होने लगी !

साथ ने उनके...सब कुछ उगला दिया,
इस पत्थर को फिर से पिघला दिया !

कर दिया 'चीनू' को खड़ा फिर उसी चौराहे पर,
'मिलन' की आस में खड़ा किया था जहाँ पर !

हाँ... आज भी बाहें फैलाएं खड़ा हूँ वहीँ पर..
एक बार.. बस एक बार फिर से चली आआअ ....

मिल जाएगी... तुझे-मुझे फिर से जिंदगी,
एक बार.. बस एक बार फिर से चली आआअ !

© पुनीत जैन 'चीनू'