बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
क्या मेरे जेहन में कुछ आया नहीं ?
बड़े दिनों से कुछ सीखा नहीं,
क्या समाज में कुछ देखा नहीं ?
बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
क्या प्रेम का अंकुर फूटा नहीं ?
बड़े दिनों से कुछ सीखा नहीं,
क्या नफरत का बीज बोया नहीं ?
हाँ... बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
शायद दुनिया से इन दिनों कुछ सिखा नहीं !
© पुनित जैन 'चीनू'

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