Friday, 14 June 2013

रिमझिम बरखा

हाँ !!
मुझे आज भी याद है
वो हमारी पहली मुलाकात
और
वो सुरमई सी सांझ !

हाँ !!
मुझे आज भी याद है
हमारा मिलन
और
रिमझिम बरखा का आगमन !

हाँ !!
मुझे आज भी याद है
वो दिन
जब हम पहली बार
भीगे थे बरसात में
हाथ थे एक दुझे के हाथ में
ख़ुशी थी इस बात की,
कि हम है साथ में !

हाँ !!
जैसे ही बरसी आज
सावन की पहली फुहार,
वो मिलन की यादें
ताजा हो आई

और !!
इन शीत बयारों से
तेरी खुशबू है आई
भिगों कर अपने प्रेम-जल में
फिर अपनी याद है दिलाई !

पर !!
यह तो सिर्फ बहाना है
तुझे याद करने का
जब-जब सोचता हूँ तुझको
तब-तब भीग उठता है मन
तेरे प्रेम और यादों की बरखा में !
जानती हो !!
अपने हर एक लम्हे को
दिल में बसाया है ऐसे
समाती हैं बारिश की
पहली फुहार धरती में जैसे !

सुनो ना !!
आज फिर उस मिलन को
एक बार जी लेने दो,
और फिर से ‘चीनू’ को
अपने प्रेम-जल में भीग जाने दो !

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