सुनो !! कल ये ठंडी हवाएं कुछ कह रही थी,
लगा जैसे, शायद तुम्हारी याद दिला रही थी !
शब् की ठंडी बयारों ने कुछ ऐसे जकड रखा था,
लगा जैसे, शायद तुमने दिल को मेरे पकड़ रखा था !
वो शब् की आगोश में चांदनी खिलखिला रही थी,
लगा जैसे, हंसी तुम्हारी चहचहा रही थी !
वो तेज हवाओं से पत्ते नाच रहे थे,
लगा जैसे, हमारा प्रेम राग गा रहे थे !
हुआ उन फिजाओं का फिजाओं से मिलन,
की मौसम हुआ मस्ताना, रही न कोई शिकन !
आया तो था मिटाने को अपनी तन्हाई,
लगा जैसे, यादों की बज रही थी शहनाई !
ये हवाएं, ये यादें ही तो 'चीनू' का सहारा हैं,
जो जी लूं इनको तो जिन्दगी मेरी बहारा हैं !
No comments:
Post a Comment