पड़ी आज सावन की पहली फुहार है,
देखो दिल में छाई खुशियों की बहार है !
तरह रही थी कब से ये धरती,
दिल की बगिया कब तक यूं रहती !
वो देखो.. काली काली घटा है छाई,
अहा.. ठंडी – ठंडी पुरवाई है आई !
वो मस्त हुआ बावरा आसमान,
झूम उठा मेरा तन बदन !
पानी नहीं प्यार है बरसा रही,
जोर से बरस.. क्यूँ और तरसा रही !
प्यार की तड़प में ही जानूं,
इतनी सी बूंदों में कैसे मानूँ !
अब तो आजा.. गागर छलका जा,
इस बरखा में, मुझको भिगों जा !
तरस रहा हूँ, तड़प रहा हूँ कब से,
अब तो आजा..मिल जा मुझसे !
कहता चीनू पुकारे कोई दिल से,
बरखा बहती नैन अम्बर से !
बहुत हुआ खेल अब तो ये,
बरस जा अब घनघोर गगन से !!
© Puneet Jain 'Chinu'

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