घर से निकलते ही एक तेरा ख़याल आता है,
चंद कदम बढ़ाते ही रास्तों का सैलाब आता है,
मंजिल की कश्मकश में होशों हवास खो बैठा हूँ,
अब तो ऐ दिलरुबा बतला दे ... किस रास्ते पर तेरा मकान आता है !
आँखे जो बंद करू तो तेरा नशा-सा छाता है,
ख्वाब जो टूटे तो धुँआ धुँआ नजर आता है,
बंद कमरे मैं बैठा तेरी खुशबू महसूसता हूँ,
खिड़की जो खोलूँ तो तेरा साया नजर आता हैं !
© पुनीत जैन 'चीनू'
चंद कदम बढ़ाते ही रास्तों का सैलाब आता है,
मंजिल की कश्मकश में होशों हवास खो बैठा हूँ,
अब तो ऐ दिलरुबा बतला दे ... किस रास्ते पर तेरा मकान आता है !
आँखे जो बंद करू तो तेरा नशा-सा छाता है,
ख्वाब जो टूटे तो धुँआ धुँआ नजर आता है,
बंद कमरे मैं बैठा तेरी खुशबू महसूसता हूँ,
खिड़की जो खोलूँ तो तेरा साया नजर आता हैं !
© पुनीत जैन 'चीनू'
No comments:
Post a Comment