Tuesday, 22 April 2014

घर से निकलते ही एक तेरा ख़याल आता है !!

घर से निकलते ही एक तेरा ख़याल आता है,
चंद कदम बढ़ाते ही रास्तों का सैलाब आता है,
मंजिल की कश्मकश में होशों हवास खो बैठा हूँ,
अब तो ऐ दिलरुबा बतला दे ... किस रास्ते पर तेरा मकान आता है !

आँखे जो बंद करू तो तेरा नशा-सा छाता है,
ख्वाब जो टूटे तो धुँआ धुँआ नजर आता है,
बंद कमरे मैं बैठा तेरी खुशबू महसूसता हूँ,
खिड़की जो खोलूँ तो तेरा साया नजर आता हैं !

© पुनीत जैन 'चीनू'

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