बस.. ऐसा ही हूँ मैं
!!
मैं
आजाद सा एक परिंदा हूँ,
मेरा
नहीं कोई घरोंदा हैं,
मेरा
नहीं कोई ठिकाना हैं,
बस.. ये पूरा आसमान मेरा हैं !
मैं
तो हूँ रेगिस्तान सा,
दूर
दूर तक फैला हुआ,
मैं
तो हूँ उस मिटटी सा,
हर
नीव मैं जिसका आधार बना हुआ !
मैं
तो हूँ उस बंजारे की तरह,
जो
कही भी ठहर जाता हैं,
धरती
को बिछोना समझ,
अम्बर
को ओढ लेता हैं !
मैं
तो हूँ उस पवन के
लहराते
हुए झोंको सा हूँ,
मैं
तो हूँ उस नदिया के नीर की तरह,
जिसका कोई छोर नहीं, कोई अंत नहीं !!
में
तो हूँ दिए की तरह,
रौशनी
बिखेरता हुआ,
हां. मैं तो हूँ बावरा सा..
अपनी
जिन्दगी का फ़साना बताता हुआ !!!
© पुनीत
जैन 'चीनू'

No comments:
Post a Comment