रोशन करे सवेरा !!
एक नयी सुबह को अपनी रौशनी दे रहा हैं ,
सारे जब को अपनी रौशनी दे रहा हैं !
दूर से तेरा स्वरुप विशाल लौ सा लग रहा हैं ,
आज नयी सुबह में जीने की प्रेरणा दे रहा हैं !
तुझ बिन श्रृष्टि का हर प्राणी अधुरा ,
तुझ बिन ये हरियाली , ये धरती अम्बर अधुरा !
दिन भर खुद जला करता हैं ,
और शमा के चाँद को रौशनी अपनी देता हैं !
सुहागिन की बिंदी सा तू ताज हैं ,
ऐ सूरज , तेरे हर रूप पर मुझे नाज हैं !
दुसरो की खातिर खुद तो जल रहा हैं ,
भटके हुओ को रौशनी की राह दिखला रहा हैं !
इस उगते सूरज ने मुझे आशा की नव किरण दी हैं ,
कहत चिनू , इसीलिए मैंने इसको धीर-गंभीर की उपाधि दी हैं !
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