मेरा बचपन
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कितना प्यारा था मेरा बचपन ,
बहुत ही कोमल सा था मेरा मन !
बहुत याद आती हैं वो मासूम सी शरारतें ,
जब किया करता था तोतली जुबान से बातें !
बहुत याद आती हैं वो यादें ,
जब अपनों से किये थे मासूम से वादें !
वो खिलोनो के लिए जिद्द करना ,
वो दिनभर मौज-मस्ती करना !
अपने छोटे-छोटे हाथों से छाप बनाना ,
अपनी हंसी और आँखों से सबको अपना बनाना !
वो मासूम सी अजीब-ओ-गरीब शक्लें बनाना ,
खाना खाने के लिए माँ को पीछे-पीछे भागना !
पापा की आवाज सुन चुपचाप बैठ जाना ,
उनके डांटने से पहले ही सो जाना !
आज जिंदगी में बहुत कुछ पा चुका हूँ ,
पर इसमें कहीं उलझ सा चुका हूँ
आज बस ..बचपन की यादों में जी रहा हूँ ,
जिंदगी के कुछ लम्हे उसके नाम कर रहा हूँ !
आज भी सब मेरी हंसी और आँखों के दीवाने हैं ,
अब पता चला.. अपनों में बहुत से बेगाने भी हैं !
कहत ‘कवि पुनीत’ जाना चाहता हूँ फिर से अपने बचपन में,
फिर से जीना चाहता हूँ उस कोमल मन की शरारतों में !
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