Sunday, 24 March 2013

मेरा बचपन –

मेरा बचपन –

कितना प्यारा था मेरा बचपन
,
बहुत ही कोमल सा था मेरा मन !


बहुत याद आती हैं वो मासूम सी शरारतें
,
जब किया करता था तोतली जुबान से बातें !


बहुत याद आती हैं वो यादें
,
जब अपनों से किये थे मासूम से वादें !


वो खिलोनो के लिए जिद्द करना
,
वो दिनभर मौज-मस्ती करना !


अपने छोटे-छोटे हाथों से छाप बनाना
,
अपनी हंसी और आँखों से सबको अपना बनाना !


वो मासूम सी अजीब-ओ-गरीब शक्लें बनाना
,
खाना खाने के लिए माँ को पीछे-पीछे भागना !


पापा की आवाज सुन चुपचाप बैठ जाना
,
उनके डांटने से पहले ही सो जाना !


आज जिंदगी में बहुत कुछ पा चुका हूँ
,
पर इसमें कहीं उलझ सा चुका हूँ


आज बस ..बचपन की यादों में जी रहा हूँ
,
जिंदगी के कुछ लम्हे उसके नाम कर रहा हूँ !


आज भी सब मेरी हंसी और आँखों के दीवाने हैं
,
अब पता चला.. अपनों में बहुत से बेगाने भी हैं !


कहत
कवि पुनीतजाना चाहता हूँ फिर से अपने बचपन में,
फिर से जीना चाहता हूँ उस कोमल मन की शरारतों में !

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