तुम कौन हो मेरी !
कभी
दोस्त बनकर साथ रहती हो,
कभी
सारे रिश्ते एक संग निभाती हो,
जाते
– जाते ये तो बताती जाओ, तुम कौन हो मेरी !
जो
मुझे इतना याद आती हो,
बिना
रिश्ते हर रिश्ता निभाती हो,
तुम
रोज मेरी खातिर चली आती हो,
आंसू
बनकर आँखों में रहती हो,
ख़ुशी
बनकर होंठो पर सजती हो,
धड़कन
बनकर दिल में रहती हो,
तुम
ये तो बता दो, तुम कौन हो मेरी !
रिश्तो
के सारे बंधन से उपर पाया तुमको.
भूल
कर भी तुम और याद आये मुझको,
उम्र
भर साथ निभाने का वादा करने वाली,
तुम
ये तो बता दो, तुम कौन हो मेरी !
© पुनीत जैन 'चीनू'

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