Thursday, 3 April 2014

फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?


सुनो ना... तुम्हे बेपनाह चाहता हूँ,
हर पल तुम्हे आँखों में समाता हूँ,
हंसी को तुम्हारी लबों पर बसाता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?

सुनो ना...एहसास तुम्हे मानता हूँ,
प्रीत के मीठे शब्दों में तुम्हे ढ़ालता हूँ,
ग़ज़लों में अपनी... तुम्हे गुनगुनाता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?

सुनो ना...हरपल तुम्हे पास रखता हूँ,
ख्वाबों में हाथ तुम्हारा थामे रखता हूँ,
तुम संग जिंदगी जीने कि आस रखता हूँ,
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?

सुनो ना...
थामना चाहता हूँ सातों जन्म तुम्हारा हाथ,
अब तो बतला दो...
फिर किस बात का है तुम्हे अफ़सोस ?

© पुनीत जैन 'चीनू'



1 comment:

  1. Lajawaab.....Puneet....
    AAtay hain khyaaloon main , khawaboon main , diloon main
    PHir hAm se ye kehtay hain k hAm parda-nashee’n hain…!!
    Keep it up.....

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