कैसे पूछूं रातों के वो फ़साने,
नहीं मिलते बातों के वो बहाने,
प्यार की रौशनी बुझ सी गयी,
अब नहीं आतें सपने वो सुहाने !
खलती है कमी उन बिखरी जुल्फों की,
हाथों से मिटानी पड़ती है दास्ताँ टीके की,
वो चादर में नहीं आती अब सिलवटें,
आदत हो गयी है, तकिये से आंसू पोछने की !
मौसम जो बरसातों के फिर से आएं,
दिल में यादों की आग फिर लगायें,
इन्ही मौसमों ने खंजर है चुभाएं,
तुमसे लिपटने में दिल अब घबराएं !
फूल हमारी यादों के मुरझायें,
बातें..वादें... नश्तर है चुभायेें,
ये वक़्त का फेर ही तो है जानेजाना,
बेदर्दी से एक-दुझे का हाथ है छुडाएं!
वो झूठा गुस्सा सच्चा हो गया,
मनाने का मेरा हक़ ख़त्म हो गया,
वो वादे, वो कसमे,वो प्यार तेरा,
सब कुछ बेगाना सा हो गया !
इतना दूर न करो मुझे खुदसे,
रह नहीं पाउँगा अब दूर तुमसे,
रिश्तें को फिर से हसीं नाम दे,
जर्रा-जर्रा दिल का जुड़ा है तुमसे !
© पुनीत जैन 'चीनू'
नहीं मिलते बातों के वो बहाने,
प्यार की रौशनी बुझ सी गयी,
अब नहीं आतें सपने वो सुहाने !
खलती है कमी उन बिखरी जुल्फों की,
हाथों से मिटानी पड़ती है दास्ताँ टीके की,
वो चादर में नहीं आती अब सिलवटें,
आदत हो गयी है, तकिये से आंसू पोछने की !
मौसम जो बरसातों के फिर से आएं,
दिल में यादों की आग फिर लगायें,
इन्ही मौसमों ने खंजर है चुभाएं,
तुमसे लिपटने में दिल अब घबराएं !
फूल हमारी यादों के मुरझायें,
बातें..वादें... नश्तर है चुभायेें,
ये वक़्त का फेर ही तो है जानेजाना,
बेदर्दी से एक-दुझे का हाथ है छुडाएं!
वो झूठा गुस्सा सच्चा हो गया,
मनाने का मेरा हक़ ख़त्म हो गया,
वो वादे, वो कसमे,वो प्यार तेरा,
सब कुछ बेगाना सा हो गया !
इतना दूर न करो मुझे खुदसे,
रह नहीं पाउँगा अब दूर तुमसे,
रिश्तें को फिर से हसीं नाम दे,
जर्रा-जर्रा दिल का जुड़ा है तुमसे !
© पुनीत जैन 'चीनू'

Vry nice by heart..
ReplyDeletebt this mood doesnt suits you..
some realtions r like ..leave it on vry beautiful turning... dont run after ..
too good poem by Heart .... shows your pain vry well. <3 <3
रातो के वो अफ़साने आज भी याद है,
ReplyDeleteबिना बात के गुस्सा होना किसी का आज भीयाद है,
अँधेरे ही थे उन प्यार की राहो में,
वो रात बार उस बेवफा के लिए आँशु बहाना आज भी याद है।
कब सवारा था उसने जालिम ने झुल्फो को,
वो उसका दर्द देने का तरीका आज भी याद है,
आँखों से ही बयांन कर देता था नाराज़गी जो,
उसके हाथो अपना तमाशा बनाना आज भी याद है।
फूल हमेशा हमने उनकी राहों में भिजाये थे,
बदले में तोफो में कांटें देना उनका आज भी याद है,
कब मनाया था उसने मुझे ये याद नही,
उस बेवफा की खता पे भी मनना आज भी याद है।
वक़्त को क्या दोष देना,
मेरा तमाशा बनाना चाहत थी उसकी
उसका दिया हर झकम आज भी ताज़ा है,
वो उसकी झूठी कसमे वादे आज भी याद है।
बड़ा मासूम बनता है वो,
उस सितमगर के झुलमो की दास्ताँ आज भी तैयार है,
कहता है खुद को वो हालात का मोहबत का मारा,
किस कदर तोडा था उसने मुझे मेरे दिल को उसकी दास्तां आज भी याद है।
एक दिन लौट के उसने एक आवाज़ दी थी मुझे,
मैंने फिर से उस पर विस्वास किया था,
आया तो फिर ये देखने था वास्तव में कितना बर्बाद किया है मुझे उसने,
फिर भी उसकी उस स्वांग को भी सच मनाना मुझे आज भी याद है।
एक सवाल मेरा काश कोई जवाब दे दे,
किस गुनाह की सजा उसने मुझे दी बतादे कोई मुझे,
और किस हक़ से वो मासूम बनता है,
उसके हर सितम हर झूठ की कहानी मुझे आज भी पूरी याद है।।