Friday, 1 August 2014

'मिलन' की आस...

रिश्ता तुझसे कुछ ख़ास था,
मेरे जीने की एक आस था !

वक़्त-बेवक़्त होती थी तुझसे बातें,
ख्वाबों में होती थी रोज मुलाकातें !

हाँ... वो वक़्त कितना अच्छा सा था,
सब कुछ सच्चा-सच्चा सा था !

एक-दुझे की बात को बिन कहे समझ लेते,
बिना बात के ही खिल-खिलाकर हंस लेते !

वो बात करने के बस बहाने ढूंढना,
वो हंसना-रोना, रूठना-मनाना !

दोस्ती कब प्यार में बदली पता ही न चला,
पाकर आँचल तेरा, सुकून से मैं बावरा हो चला !

वो दोस्ती, वो रिश्तेदारी कुछ अजब सी थी,
प्यार में हमारे वफ़ादारी कुछ गजब सी थी !

वो ख्वाबों की बातें तड़पाने लगी थी,
वो मीलों की दुरी सताने लगी थी !

वक़्त एक ऐसा आया, मिलने का मोड़ आया,
पर हाय रे किस्मत...जिंदगी ने ये क्या मोड़ खाया ??

वो दिन भर की बातें, वो अनगिनत यादें..
सब कुछ हवा हो गयी,
ना जाने किन बातों से मेरी जान,
मुझसे रुस्वा हो गयी !

रिश्ता हमारा... कांच सा टूट सा गया था,
साथ हमारा... हाथों से छूट सा गया था !

अब तो बस... यादें ही बची थी,
मिलन की उनसे फरियादें ही बची थी !

हर कोशिश की उनसे गुफ्तगू करने की,
कसक न छोड़ी कोई नफरत करने की !

टुटा...बेदर्दी से... सब कुछ फना-फना सा था,
निकला जब आगे... अँधेरा घना-घना सा था !

वक़्त-औ-हालातों की राहों पर चलता चला,
कोशिश उनसे मिलने की मैं करता चला !

दौर आये ज़िंदगी में कुछ ऐसे,
बात हुई उनसे..
पर लगा है कोई जिन्दा लाश जैसे !

लिखकर नाम उनके मैं मिटाता चला,
मैं टुटा इस कदर की छुपाता चला !

वक़्त के बदलाव के साथ उम्मीदे जगने लगी,
यादों की आग दोतरफा जलने लगी !

कुछ बहानों से फिर मुलाकात होने लगी,
इन्तजार में उसके... शाम होने लगी !

साथ ने उनके...सब कुछ उगला दिया,
इस पत्थर को फिर से पिघला दिया !

कर दिया 'चीनू' को खड़ा फिर उसी चौराहे पर,
'मिलन' की आस में खड़ा किया था जहाँ पर !

हाँ... आज भी बाहें फैलाएं खड़ा हूँ वहीँ पर..
एक बार.. बस एक बार फिर से चली आआअ ....

मिल जाएगी... तुझे-मुझे फिर से जिंदगी,
एक बार.. बस एक बार फिर से चली आआअ !

© पुनीत जैन 'चीनू'

2 comments:

  1. रातो के वो अफ़साने आज भी याद है,
    बिना बात के गुस्सा होना किसी का आज भीयाद है,
    अँधेरे ही थे उन प्यार की राहो में,
    वो रात बार उस बेवफा के लिए आँशु बहाना आज भी याद है।

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